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… लेकिन राह काटों भरी है!

भारत में डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने से सभी खुश हैं। गौर रक्षक खुश हैं। समाजवादी अपनी सी-क्लास मर्सीडीज में अब अधिक विश्वास के साथ समाजवादी विचारधारा का प्रचार कर सकेंगे। अब विकास बड़ा मुद्दा है। रियल एस्टेट वाले खुश हैं। वह भी प्रधानमंती बन सकते हैं। टैक्स चोर खुश हैं। अमेरिका में अच्छे दिन आ गए हैं। भारत के प्रॉपर्टी डीलर विधायक तक बन गए हैं… लेकिन प्रधानमंत्री की कुर्सी अभी दूर लगती है।

वामपंथी को उम्मीद है कि बंगाल उनको वापस मिल जाएगा। नोटबंदी का मामला उठाने से ममता जी केंद्र की निशाने में हैं। अगर ट्रम्प जीत सकते हैं तो सीपीएम क्यों नहीं । आजकल दिल्ली और कोलक़ता में फिर से प्रगतिशील ताकतें मजबूत हो रहीं हैं। दिल्ली में जेएनयू से लेकर त्रिवेंद्रम तक कम्युनिस्ट अब जम कर स्कॉच पीकर साम्राज्यवादी अमेरिका को कोसेंगे।

कांग्रेसी सोच रहे हैं कि सॉफ़्ट हिंदुत्व से अब काम नहीं चलेगा। ट्रम्प की तरह खुलकर हमें हिंदुत्व प्रमोट करना होगा। राष्ट्र की एकता के नाम पर हिंदुओं के वोट बटोरने के बाद अब धर्म का इस्तेमाल ज़रूरी लगने लगा है। बालक अखिलेश से यह उम्मीद नहीं थी की वह अमेठी की सीट भी कांग्रेस को नहीं देगा। आख़िर समाजवादी पार्टी को कांग्रेस के बूते ही मुस्लिम वोट मिलने वाला था। मुलायम चाचा ने तो मोदी से हौब नौब्बिंग करके मुसलमानों को नाराज़ कर लिया था। कांग्रेस ने सेक्युलर ताकतों को मज़बूत करने के लिए ही अखिलेश को सपोर्ट किया था। अब अखिलेश भोगें । कांग्रेस को यह भी डर लग रहा है कि अखिलेश कहीं २०१९ मे ट्रम्प की तरह प्रधान मंत्री पद के दावेदार ना हो जाएं।

भाजपा और संघ फूले नहीं समा रहे है। उनके लिए ट्रम्प की जीत भाजपा के राष्ट्रवादी सोच की जीत है। यह सोच मोदी जी के नेतृत्व में सात समुन्दर पार अमेरिका में छा गई है।
धीरे धीरे भारत के अलग अलग राज्यों में इसका असर दिखाई पड़ रहा है या पड़ने लगेगा । सबसे पहले केरल को देखें। केरल में लेफ़्ट मोर्चा पावर में इसलिए आ गया क्योंकि कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने बीफ़ फेस्टिवल नहीं किया। केरल कांग्रेस के ईसाई मतदाताओं को कांग्रेस की स्पष्ट नीति समझ नहीं आई। उनको इएमएस नम्बूद्रिपाद की त्याग और सेक्युलर विचारधारा अधिक रास आ गई। संघ समर्थक हिन्दूमुन्नानी आदि को वामपंथी मुस्लिम लीग और कांग्रेस गठबंधन से अधिक उचित लगे।

तमिलनाडू की राजनीति फ़र्क है। जयललिता के बाद तमिलनाडू फ़र्स्ट का नारा लगाएगा क्योंकि उनको डीएमके को हराना है। स्टॅलिन के नेतृत्व में डीएमके का मुकाबला इस समय सत्तारूढ़ एआई-डीएमके के लिए कठिन जान पड़ता है।
आंध्र और तेलंगाना अलग अलग प्रदेश बन गए हैं । लेकिन इन दोनों प्रदेशों में कांग्रेस कहीं नहीं है। इन दोनों स्थानों में क्षेत्रीय दल सत्ता में काबिज हैं। यहाँ भी अपने अपने प्रदेशों को फ़र्स्ट बनाए रखने का नारा लग सकता है। महाराष्ट्र में मोदी और शिव सेना की नहीं पट रही है। ओडिशा में भी नवीन पटनायक का क्षेत्रीय दल सत्ता में है।

राष्ट्रीय दलों की कमज़ोर स्थिति से इंडिया फ़र्स्ट का नारा कमजोर हो सकता है। इसलिए इंडिया फ़र्स्ट के नारे को फिर से समझना होगा । मोदी का नारा चल गया है… इसकी गूँज ट्रम्प के चुनाव प्रचार में सुनाई दी है। किन्तु उनका विजय रथ थम-सा गया है।

कांग्रेस पार्टी ने क्षेत्रीय नेताओं की औक़ात ख़त्म कर दी, अब यही काम मोदी और उनके घनिष्ट सहयोगी अमित शाह भाजपा में कर रहे हैं। ट्रम्प ने अमरीका में रिपब्लिकन पार्टी में कर ही दिया है। पावर में आ गए हैं। लेकिन पावर गेम सत्ता में आने के बाद शुरू होती है। न ट्रम्प समझ सके हैं और न मोदी। राजीव गाँधी को ग़लतफ़हमी हो गई थी कि उनको जो अपार बहुमत मिला था, वह उनकी लोकप्रियता के कारण था। वह भूल थी कि वह भारत की इंदिरा गाँधी को श्रद्धांजलि वोट था। इसी तरह ट्रम्प को वोट इस आधार पर मिला था कि ग़ैरक़ानूनी ढंग से अमेरिका में घुसे विदेशियो ने आम आदमी से उसका रोज़गार छीन लिया है और मुसलमानों ने दुनिया भर में आतंकवाद पैदा किया है। ट्रम्प की यह बात सच ज़रूर है कि सीआईए की भूमिका आतंकवाद बढ़ाने में रही है । मुसलमानों का पहले इस्तेमाल किया गया और फिर उनको आतंकवादी करार दिया गया।

अब देखना यह है कि ट्रम्प अपने बड़े बड़े भाषणों से क्या निकल पाते हैं। उनकी विफलता से पूरी दुनिया में भारत की भांति निराशा फैलने का डर है।

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