यह लेख श्री अम्बिका प्रसाद वाजपेयी ने 1957 के निर्वाचन से पहले लिखा था। आज की तारीख़ में इसे पढ़ने पर यह एहसास होता है कि यह कितना सटीक और सामयिक है, फिर सत्ताधारी पार्टी चाहे कोई भी हो।

आगामी २५ फरवरी से १२ मार्च तक प्रायः तक सारे देश में निर्वाचन की धूम रहेगी, क्योंकि इसी बीच में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभा और कुछ को छोड़ कर सभी विधान सभाओं का निर्वाचन होगा। यह भी इस युग का एक तमाशा है, इच्छा या अनिच्छा से सबको देखना पड़ता है। पिछले (१९५२) निर्वाचन में १० करोड़ रुपये खर्च हुए थे। पर कहते हैं कि इस निर्वाचन में एक ही करोड़ खर्च होंगे। फिर ग़रीब देश के लिए इस तमाशे में एक करोड़ रुपये खर्च करना घर फूंक तमाशा देखने के सामान है। हमने जिस प्रकार का संविधान स्वीकार किया है, वह पाश्चातय ढंग का है जहां धन की कमी नहीं है। पर हमने उनके पैर पर पैर रखा है कुछ तो इसलिए की हम कम्युनिज़्म के विरोधी हैं या उसे पसंद नहीं करते, अथवा दोनों से भिन्न कोई तीसरी शासन पद्धति की उद्भावना करने में असमर्थ हैं।

परन्तु इसमें जो सबसे बड़ी भूल की गयी है, वह प्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति स्वीकार करना है। प्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति और परोक्ष वा अप्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति में श्रेष्ठता वा निकृष्टता का प्रश्न नहीं है। प्रश्न केवल अनुकूलता वा प्रतिकूलता का है। “भांटा काहू को पित्त करत, करत काहू को बात”। यह सभी स्वीकार करेंगे कि धन और विद्या दोनों में अमेरिका हमसे बढ़ा-चढ़ा है, पर वहां अप्रत्यक्ष निर्वाचन होता है। पर जो निर्धनता और निरक्षरता का गढ़ है, वहां प्रत्यक्ष निर्वाचन है। क्यों? इसलिए किसानों का काम हम महीनों में नहीं, सप्ताहों में करना चाहते है। कहा जा सकता है कि प्रत्येक मनुष्य अपना हित्राहित समझता है। तुलसीदास कहते हैं, “हित अनहित पशु पंछिहू जाना, मानुष तन विगान निधाना”। अपना निजी वा पारिवारिक हित मनुष्य समझ सकता है, पर इतने बड़े राष्ट्र का हित किसमें है और किसमें नहीं है, यह अपढ़ अशिक्षित मनुष्य की समझ के वाहर है।

दूसरी बात यह है कि ग़रीब-अमीर सबका निर्वाचन में समान अधिकार है। वो राष्ट्रपति के पद से लेकर प्रादेशिक विधान सभा की मेम्बरी तक का उम्मीदवार हो सकता है। किसी के लिए रोक-टोक नहीं है। इसके सिवा कांग्रेस समाज की रचना समाजवादी ढंग पर करना चाहती है। अर्थात् किसी प्रकार के भेदभाव के पक्ष में नहीं है। वास्तव में यह बहुत अच्छी बात है। कहने से सुनने वाले का मुंह मीठा नहीं हो जाता, वैसे ही “समाजवादी ढंग के समाज की स्थापना कांग्रेस की कामना है” कहने से ही सब भेद-भाव मिट नहीं जाते। यह कैसा सामाजिक ढंग है, जिसमें लोक सभा के उम्मीदवार को २५०००/ और विधान सभा के उम्मीदवार को ५०००/ अपने चुनाव के लिए खर्च करने पड़े। इसमें ग़रीब का स्थान कहां है?

इस देश में कितने लोग इतनी रक़म लगाकर चुनाव लड़ सकते हैं? आजकल जो लोग कामकाज में लगे हुए हैं, उन्हें भी अपना संसार चलाना कठिन हो रहा है। जो बेकार हैं, उनको सवेरे से शाम तक कामकाज की खोज में टक्करें मारनी पड़ती हैं। फिर इतनी रक़म इकठ्ठा करके कौन चुनाव के जुए में दांव लगाए और वह आए भी कहां से। व्यापार की किसी योजना में साझेदारी के आधार पर रूपये लगाने वाले भी मिल सकते हैं। पर सट्टे या फाटके में रक़म लगाने वाला नहीं मिलता और चुनाव भी सट्टा ही है, जिसमें रक़म डूबने का चांस अधिक रहता है। वकील भी आधे साझे ऐसी ही शर्तो पर सम्पत्ति के मुक़दमे खरीदते हैं। पर चुनाव का मुक़दमा तो वकील भी नहीं खरीदते क्योंकि यह विल्कुल भाग्य या चांस का खेल है। चांस ही नहीं, पैसे का भी खेल है।

१८ करोड़ मतदाता हैं, पर शिक्षित बहुत ही कम हैं। राज-काज चलाने और उस पर मत देने के लिए अशिक्षित अत्यन्त अनुपयुक्त होते हैं। अंग्रेज़ चले गये हैं सही, पर हमारा शासन कार्य अंग्रेज़ी द्वारा ही होता है। उसी में क़ायदे क़ानून बनते हैं और छापते हैं। पर ३६ करोड़ मनुष्यों में साक्षरों की संख्या ६ करोड़ है, और अंग्रेज़ि शिक्षितों की संख्या ३२ लाख से अधिक नहीं है। ऐसी स्थिति में अशिक्षित और अर्ध-शिक्षित मनुष्य जो किसी तरह निर्वाचित होकर संसद और विधान सभाओं में जाते हैं, वे हाथ उठा देने के सिवा कुछ नहीं कर सकते। यदि अप्रत्यक्ष निर्वाचन होता तो ये निर्वाचन केंद्र को ही चुन सकते थे, प्रतिनिधियों को नहीं। हमारे नेताओं ने अशिक्षितों के लिए प्रत्यक्ष निर्वाचन की व्यवस्था की है जव अमेरिका में शिक्षितों के लिए भी अप्रत्यक्ष निर्वाचन का नियम है। धन और शिक्षा दोनों दृष्टियों से भारत के लिए प्रत्यक्ष निर्वाचन अनुपयुक्त है।

हमने पाश्चात्य देशों की नकल की है। यह नकल वैसी है जैसी कोई कंगाल धनी की नकल करे। पहले हमारे देश के प्रांत प्रदेश कहलाते थे, पर स्वराज्य के बाद वे अमेरिका की नकल पर राज्य बना दिए गये। अमेरिका में राज्यों ने केंद्र का निर्माण किया था, पर हमारे यहां के केंद्र ने राज्यों की सृष्टि की है। ब्रिटेन में जैसे संसद की दो सभाएं – लोकसभा और सरदार सभा है और अमेरिका में सेनेट और प्रतिनिधि सभा है – वैसे ही हमारे यहां लोकसभा और राज्य सभा रख दी गयी है। जब हमारे देश में विविध प्रकार के लोगों के हित थे, तब ऐसी दो सभाओं का प्रयोजन था। पर अब तो राजा, महाराज, ज़मींदार आदि सबका सफ़ाया हो गया और अमीर-ग़रीब का भेद मिटाने की चर्चा हो रही है? तब दो सभाओं का क्या प्रयोजन रहा?

परन्तु केंद्र में ही नहीं, तथोक्त राज्यों में भी दो सभाओं की उपयोगिता पर ज़ोर दिया जा रहा है। प्रधान मंत्री नेहरु का कहना है कि उच्च सभाओं में हमें अच्छे विचार मिलते हैं, इसलिए उनको वनाये रखना आवश्यक है। पर विचार जानकर भी क्या सरकार उन विचारों से लाभ उठाती है? यदि नहीं, तो कौंसिलो व विधान परिषदों की उपयोगिता क्या है? फिर उत्तर प्रदेश के विधान मंडल ने परिषद् को बनाए रखने का ही नहीं, उसकी संख्या ड्योढ़ी, अर्थात् ७२ से १०८, करने का प्रस्ताव पास कर लिया है। जोधपुर में कविराजा मुरारिदान जज बना दिए गये थे। वे ऊंचा सुनते थे। इस पर एक कवि ने एक पद्य में कहा कि जिसे अधिक सुनना चाहिए वह कम सुनता है। उसी तरह हम कहते हैं कि जिस संस्था की आवश्यकता ही नहीं है उसकी समुष्टि हो रही है। यह सार्वजनिक धन का दुरुपयोग नहीं तो क्या है?

राज्य पुनर्गठन द्वारा २७ राज्य घटाकर १७ राज्य रख दिए गये हैं। इस सुबुद्धि के लिए हम सरकार की प्रशंसा करते हैं। इसके साथ ही निर्वाचन आयुक्त, श्री सुकुमार सेन, भी प्रशंसनीय हैं जिन्होंने अखिल भारतीय पार्टियों की संख्या घटाकर चार कर दी है। हमारे देश की पार्टियाँ लीडरों को जीवित रखने में ही सहायता करती हैं। कांग्रेस के सिवा देश में कौन- कौन सी पार्टियाँ हैं, जिनके सदस्यों की संख्या लाख दो लाख है? जिस अखिल भारतीय पार्टी में एक लाख सदस्य भी नहीं हैं, वह किस वित्त पर निर्वाचन के मैदान में उतरने का साहस कर सकती है। कांग्रेस के पास जनबल और धनबल दोनों है और इन्हीं से जीत हो सकती है। कांग्रेस की सरकार है, इसलिए सरकार से काम निकालने के लिए कांग्रेस की सहायता करना लोग कर्तव्य समझते हैं। भोपाल के नवाब ने २५०००/- और इंदौर के महाराज ने ३००००/- कांग्रेस फ़ंड में दिए हैं। टाटा आदि व्यापारी भी लाख दो लाख उसी में देंगे। सुना है कि कानपुर के व्यापारी दो करोड़ देंगे। इन करोड़ों के सामने यदि अन्य पार्टीयों ने लाखों भी जमा कर लिए तो क्या होगा?

इसके सिवा अनेक पार्टियाँ और इनके नेता कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं। क्योंकि वे समझते हैं कि कांग्रेस में रह जायेंगे, तो हमारे पाले भी पड़ जाएगा। अलग पार्टियों में रहेगें तो “विकिर पिंड” की तरह कोई पूछेगा भी नहीं। अकाली आ ही गये हैं और अनुसूची युक्त लोगों की संख्या भी कांग्रेस में मिलने की सोच रही है। ऐसी स्थिति में जो पार्टियां रह जाएंगी, उनकी कोई हस्ती न रहेगी। जो कल तक कम्युनिस्ट समझे जाते थे, वे यदि आज कांग्रेस के मेंबर बन जायं… गर कुफ़्र बरखेज़द कुजा बाशद मुसलमानी (कवि में अगर कुफ़्र निकले तो मुसलमानी कहां रही)।

समाजवाद का शंखनाद करने वालों का जब यह रंग है, तब विपक्ष में बची हुई पार्टियों में यदि कांग्रेस से मोर्चा कोई लेगी, तो वह जनसंघ पार्टी ही होगी। उसके प्रतिनिधि भी कांग्रेस के जन-धन-बल के सामने क्या कर सकेंगे, यह प्रश्न है। जो पार्टी शासन व्यय और टेक्स घटाने की प्रतिज्ञा करेगी, उसके वोट पाने की संभावना अधिक है, क्योंकि वर्तमान शासन में खर्च बेहिसाब बढ़ रहा है। प्रजा इतना कर भार उठाने में समर्थ नहीं है। डेमोक्रेसी व्यय साध्य है सही, पर लोगों के सामने प्रश्न हे कि देश के लिए डेमोक्रेसी है या डेमोक्रेसी के लिए देश?

इसके साथ ही डेमोक्रेसी के लिए स्वस्थ विपक्ष का प्रयोजन है। पर लक्षणों से जान पड़ता है कि इस देश में जो डेमोक्रेसी होने वाली है, वह एक ही पार्टीवाली, वैसी ही होगी जैसा गाजी मुस्तफा कमाल पाशा ने १९२२ के बाद तुर्की में चलायी थी। नेहरुजी ने अपनी आत्मकथा में लार्ड एक्टटन का यह कथन उधृत किया है कि शक्ति मनुष्य को बिगाड़ देती है और पूर्ण शक्ति पूर्ण रूप से। यदि अगले निर्वाचन में समाजवादी पार्टियों के लोग संसद और विधान सभाओं में सवेरे के नक्षत्रों का भाँती रह गये तो विपक्ष का अंत ही समझिये। फिर डेमोक्रेसी की गाड़ी कैसे चल सकेगी?

कांग्रेसवाले अपना प्रबल बहुमत चाहते हैं और यह उनके लिए स्वाभाविक भी है, क्योंकि पार्टी तो दूसरी पार्टी को देख ही नहीं सकती। वह प्रयाग वाले पंडे की तरह कहती है “आओ यजमान, गहरे घाट पसिया पिछौरी हमारे हांथ”। और कांग्रेस का प्रकांड बहुमत डेमोक्रेसी की कपालक्रिया ही कर देगा। आज भी कांग्रेस जिस स्थिति में है उसमें वह अन्य पार्टियों की बात पर यदि ध्यान देती, तो इन पर कृपा करके ही। इनकी शक्ति ही इतनी नहीं है जिसके सामने वह झुक सके।

इसलिए रूस में, जहां प्रजा का अधिनायकत्व है, वहां हमारे देश में कांग्रेस का हो जाएगा। यह बात दूसरी है कि अन्य पार्टियों के नायकत्व से कांग्रेस का नायकत्व अच्छा ही है। पर जिस डेमोक्रेसी की दुहाई दिया करते है उसका तो नामोंनिशान ही मिट जाएगा। अन्य पार्टियाँ चाहे ध्यान दें या न दें, कांग्रेस को दुर्लक्ष्य नहीं करना चाहिए। सिद्धांत के साथ चलना जितना दूसरी पार्टियों के लिए हितकर है, उतना ही कांग्रेस के लिए भी, यह किसी को नहीं भुलाना चाहिए। यह भूलने की बात नहीं है कि कांग्रेस यद्यपि बड़ी पार्टी है, पर देश उससे भी बड़ा है।