अगला राष्ट्रपति कौन होगा, इस विषय पर राजनीतिक क्षेत्रों में चहल पहल शुरू हो गई है। उम्मीदवारों का नामांकन हो चुका है और वे अपने-अपने चुनाव प्रसार में लग गए हैं। 17 जुलाई को चुनाव हो जाएगा और 20 जुलाई तक परिणाम भी आ जाएंगे।

आइए जाने कि राष्ट्रपति चुनाव के मुख्य चरण क्या हैं।
चूंकि यह चुनाव प्रत्यक्ष नहीं होता – वह भारतवर्ष की तमाम विधान सभाओं और लोकसभा, राज्य सभा के निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा एक विशेष मतदान प्रणाली से चुना जाता है – इसलिए इस चुनाव का अंकगणित दूसरा ही होता है। सत्तारूढ़ दल और विरोधी दल अपना नफ़ा-नुक्सान तौलते हैं। पर सभी राज्यों में स्थिति एक-सी नहीं है। किसी एक पार्टी का वर्चस्व अब नहीं रहा। किसी हद तक यह कहा जा सकता है कि जात-पांत, लाठी-गोली, रूपया-पैसा, अपराध और राजनीति की सांठगांठ का जो रूप लोकसभा, विधान सभा के चुनाव में देखा जाता है, वह राष्ट्रपति के चुनाव में नहीं प्रकट होता। वैसे, राजनीतिक दलों के आपसी गठजोड़ और दांवपेंच की पूरी गुंजाइश होती है, जिसकी बानगी हमे पहले भी मिल चुकी है।

राष्ट्रपति का व्यक्तित्व इन सबके ऊपर है। हम यह मान कर चलते हैं कि जो व्यक्ति राष्ट्रपति के पद पर निर्वाचित होता है, चाहे वह किसी पार्टी या पार्टीयों के समर्थन पर निर्वाचित हुआ हो, वह राजनीति से ऊपर उठकर, बिना किसी पक्षपात, लोभ-मोह के अपने कर्तव्यों का निर्वाह करेगा। हमारी संसदीय प्रणाली के अंतर्गत कई प्रधानमंत्रियों को अपने पद से हटना पड़ा – मोरारजी देसाई, चरण सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर,अटल बिहारी वाजपेयी, देवे गौड़ा, इन्द्र कुमार गुजराल।
किंतु, अभी तक ऐसा मौका नहीं आया है कि एक बार निर्वाचित होने के बाद किसी राष्ट्रपति को हटाना पड़ा हो। ऐसा नहीं है कि राष्ट्रपति को हटाया नहीं जा सकता, लेकिन उसे हटाना कहीं अधिक मुश्किल है। प्रधानमंत्री और उनकी सरकार के खिलाफ़ लोकसभा में एक वोट भी अधिक हो तो उन्हें जाना पड़ेगा, जैसा पहले हो चुका है। किंतु, राष्ट्रपति के बारे में संविधान के अनुच्छेद ६१ में “महाभियोग” (इंपीचमेंट) की जो व्यवस्था है, उसके अधीन लोकसभा, राज्यसभा दोनों में दो-तिहाई वोटों से अभियोग-पत्र पास हो जाए, तभी राष्ट्रपति के हटने की नौबत आ सकती है।
राष्ट्रपति पद पर अब तक एक से एक जाने माने वरिष्ठ व्यक्ति निर्वाचित हुए हैं। उनके किसी कार्य व्यवहार से कोई, चाहे प्रधानमंत्री ही क्यों न हो, कभी असंतुष्ट हुआ हो, तो भी राष्ट्रपति को हटाने की बात किसी ने नहीं की। उल्टे, ऐसे अनेक मौके आए हैं जब राष्ट्रपति ने अपनी नेक सलाह से प्रधानमंत्री और उनकी सरकार की रक्षा की है। इसलिए राष्ट्रपति का चुनाव साधारण दल-बंदियों और राजनितिक शिष्टाचार से कही बढ़चढ़ कर है।
यह इस देश का परम सौभाग्य है कि भारत के पहले राष्ट्रपति देशरत्न राजेन्द्र प्रसाद निर्वाचित हुए थे। राष्ट्रीय आंदोलन के अग्रणी नेता होने के अलावा संविधान सभा की अध्यक्षता का अनुभव होने के कारण उन्होंने संविधान की रक्षा ही नहीं की, अपनी सूझबूझ से इसे नए आयाम दिए।
राष्ट्रपति के बाद कोई अन्य पद नहीं है।
डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद के बाद जो राष्ट्रपति हुए – डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन, डाक्टर ज़ाकिर हुसेन, श्री वराहगिरि वेक्ट गिरि, श्री फख़रुद्दीन अली अहमद, श्री नीलम संजीव रेड्डी, ज्ञानी ज़ैल सिंह, श्री रामास्वामी वेंकटरमण, डाक्टर शंकर दयाल शर्मा, श्री के. आर. नारायणन से ले कर डाक्टर अब्दुल क़लाम तक – सभी ने अपने कार्यकाल में अपनी निष्पक्षता बरक़रार रखने का सतत प्रयास किया और संसदीय व्यवस्था की मौजूदा कमज़ोरियों के बावजूद इसे संभाले रखा। यह भी विशेष ध्यान देने योग्य है कि एक बार राष्ट्रपति होने के बाद अभी तक कोई व्यक्ति किसी अन्य पद का तलबगार नहीं हुआ है। यह परम्परा कायम रहनी चाहिए। वर्ना, अपने कार्यकाल में ऐसे निर्णय करने का प्रोत्साहन प्राप्त होता रहेगा जो उन्हें बाद में कुछ आकर्षक पदों पर प्रतिष्ठित कर सके।
सभी पार्टियां अपने मंसूबों को ध्यान में रखकर अपनी नज़रें दौड़ाती हैं और अपने संभावित सहयोगियों को टटोलती हैं क्योंकि राष्ट्रपति के निर्वाचन क्षेत्र की पेंचदगियां देखते हुए कोई अकेले किसी को अब इस पद पर बैठाने में कामयाब होने के ख्वाब नहीं देख सकता।
सभी पार्टियां अपने अंतर्विरोध और परस्पर राग-द्वेष से ऊपर उठकर सलाह मशविरा करें तो अपना और अपने देश, दोनों का भला कर सकती हैं।
इस पद की मर्यादा और गरिमा बनाये रखने के लिए श्रीमदभगवद्गीता का एक श्लोक बहुत सार्थक है:
यद्यदा चरित्श्रेष्ठ्स्तात्त्देवेतरोजन:।
स यत प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्त्तते॥
(समाज के श्रेष्ठ पुरुष का आचरण जैसा होता है, वह जिन आदर्शो की प्रतिष्ठा करता है , उसका अनुसरण अन्य लोग करते है।)
ऐसा श्रेष्ठ पुरुष कौन है, इसका निर्णय जब औरों के हाथ में होता है तो उन “औरो” की योग्यता भी कसौटी पर चढ़ जाती है।
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यह लेख उपेन्द्रजी के संग्रह से लिया गया है। – संपादक